विडम्बना
"विडंबना " भूमिका : यह रचना मेरे हृदय के बहुत निकट है| यह कविता मैंने अपनी स्नातक (ग्रेजुएशन) के दौरान नवभारत टाइम्स में छपी ख़बर से प्रभावित होकर रची| जिसमें गुजरात में आए भूकंप के बाद एक माँ तथा उसके नवज़ात शिशु को पूरे 5 दिनों बाद मकान के मलबे के ढ़ेर के नीचे से निकाला गया था| बाद में माँ से पूछने पर कि वो इतने दिनों तक बग़ैर कुछ खाये -पिये मलबे के ढ़ेर के तले आप स्वयं व अपने शिशु को कैसे जीवित रख सकीं ? माँ ने ईश्वर का धन्यवाद् करते हुए, जो बताया वो इतना विस्मयकारी व मार्मिक था (मेरे लिए,माँ के लिए नहीं), क्योंकि उसके लिए ये एक सामान्य कार्य था| जिसके कारण मेरे कवि हृदय (यदि आप लोग मुझे कवि कहलाने का आशीर्वाद इस रचना को पढ़ने के उपरांत देंगें) में उठते द्वंद्वों अपितु विचारों को मैंने अपनी लेख नी द्वारा शब्दों का समूह बनाकर एक कविता कहने का प्रयास किया है| जानते हैं माँ ने क्या जवाब दिया ?"प्रारंभ में तो पहले दिन मैंने उसे अपना दूध पिलाकर उसकी भूख शांत करने की कोशिश की,किन्तु बाद में दूध आना बंद हो गया और भूख से बिलखता बालक देख मैंने अपनी तर्जनी उँगली जिसमें ...